Wednesday, February 10, 2010

आखिर जुदा होना ही था , ये ज़ाहिर सी बात थी
हम तो बा-वफ़ा थे , उन्हें किसी बेवफा कि तलाश थी

दो राहे पर जिंदगी के,तन्हा ही रहे हमेशा
वों आज मेरे पास है , न तब मेरे पास थी


बाद -ऐ -मौत भी ,हिकारत1 से देखती रही तुम
रास्ते पर लावारिस , मेरी वफाओ कि लाश थी


गैरो से क्या उम्मीद करते ,क्या निभाएँगे रस्मे-मोहब्बत
उसने भी साथ छोड़ दिया ,जो मेरी सबसे खास थी


लौट आओगे मेरे पास, एक रोज तड़प कर तुम
तोड़ दिया उसे भी , ये मेरे जीने की आस थी


इस कदर मुख्तलिफ 2 थे ,तेरे अरमान ऐ 'आफताब'
मैं चाहता था जमीं अपनी , उसके ख्यालों में परवाज3 थी


हिकारत -घृणा ,मुख्तलिफ -अलग,परवाज -उडान


2 comments:

  1. सुन्दर रचना ...
    आखिर जुदा होना ही था , ये ज़ाहिर सी बात थी
    हम तो बा-वफ़ा थे , उन्हें किसी बेवफा कि तलाश थी

    शेर दिल को छू गया

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  2. hi Bhai Keise ho
    Chalo Website ke jariye hi sahi ek dost se mulakhat to hui

    Surendra Tetarwal
    9414236018

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