आखिर जुदा होना ही था , ये ज़ाहिर सी बात थी
हम तो बा-वफ़ा थे , उन्हें किसी बेवफा कि तलाश थीदो राहे पर जिंदगी के,तन्हा ही रहे हमेशा
वों आज मेरे पास है , न तब मेरे पास थी
बाद -ऐ -मौत भी ,हिकारत1 से देखती रही तुम
रास्ते पर लावारिस , मेरी वफाओ कि लाश थी
गैरो से क्या उम्मीद करते ,क्या निभाएँगे रस्मे-मोहब्बत
उसने भी साथ छोड़ दिया ,जो मेरी सबसे खास थी
लौट आओगे मेरे पास, एक रोज तड़प कर तुम
तोड़ दिया उसे भी , ये मेरे जीने की आस थी
इस कदर मुख्तलिफ 2 थे ,तेरे अरमान ऐ 'आफताब'
मैं चाहता था जमीं अपनी , उसके ख्यालों में परवाज3 थी
हिकारत -घृणा ,मुख्तलिफ -अलग,परवाज -उडान
सुन्दर रचना ...
ReplyDeleteआखिर जुदा होना ही था , ये ज़ाहिर सी बात थी
हम तो बा-वफ़ा थे , उन्हें किसी बेवफा कि तलाश थी
शेर दिल को छू गया
hi Bhai Keise ho
ReplyDeleteChalo Website ke jariye hi sahi ek dost se mulakhat to hui
Surendra Tetarwal
9414236018