Wednesday, June 24, 2009

युवा

कल था मैं युग का गौरव ,
आज
भटकता बाजारों में ,
मौत के हाथों बेच दिया मुझे ,
समाज
के ठेकेदारों ने
इन आंधियों में भटकता रहा हूँ मैं ,
दिशा दो मुझे कि, युवा हूँ मैं .........................
अहिंसा थी जिसने सिखलाई ,
बुद्ध वही गौतम हूँ मैं ,
मर्यादा को मर्यादित किया ,
वही मर्यादा पुरषोत्तम हूँ मैं,
सत्याग्रह चलाने वाला ,
गाँधी मैं ही हूँ ,
भगत सिंह नाम से चली जो ,
इन्कलाब की आंधी मैं ही हूँ ,
अपनी परिभाषा ढूंढ़ता ,भटक रहा हूँ मैं ,
सम्भालों मुझे कि , युवा हूँ मैं......................

4 comments:

  1. लीजिए संभाल लिया..
    बस अब कुछ करके दिखाइए...और कुछ बेहतर रचनाएं..

    शुभकामनाएं...

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  2. bahut khoob likha hai... waah waah ..choti si nazm me aaj ke yuva ki baat kah di hai ..badhai

    vijay

    pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

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