कल था मैं युग का गौरव ,
आज भटकता बाजारों में ,
मौत के हाथों बेच दिया मुझे ,
समाज के ठेकेदारों ने
इन आंधियों में भटकता रहा हूँ मैं ,
दिशा दो मुझे कि, युवा हूँ मैं .........................
अहिंसा थी जिसने सिखलाई ,
बुद्ध वही गौतम हूँ मैं ,
मर्यादा को मर्यादित किया ,
वही मर्यादा पुरषोत्तम हूँ मैं,
सत्याग्रह चलाने वाला ,
गाँधी मैं ही हूँ ,
भगत सिंह नाम से चली जो ,
इन्कलाब की आंधी मैं ही हूँ ,
अपनी परिभाषा ढूंढ़ता ,भटक रहा हूँ मैं ,
सम्भालों मुझे कि , युवा हूँ मैं......................
लीजिए संभाल लिया..
ReplyDeleteबस अब कुछ करके दिखाइए...और कुछ बेहतर रचनाएं..
शुभकामनाएं...
good luck.narayan narayan
ReplyDeleteचमकते रहें आफताब बनकर
ReplyDeletebahut khoob likha hai... waah waah ..choti si nazm me aaj ke yuva ki baat kah di hai ..badhai
ReplyDeletevijay
pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com