Thursday, April 2, 2009

लम्हा

रूक जा ज़रा , ऐ जाते हुए लम्हें ।
कितनी बार मरे, हम तुझे जीने के लिए ॥


मुस्कुरा के उसने यूँ देखा, हमारी जानिब ।
शिकवा भूल, शुक्रिया कह आए,आने के लिए ॥

भूले से भी वो इधर आते ही नहीं।
इक फसाना भी जरूरी है उन्हें बुलाने के लिए ॥

महफ़िल में रोशन है शमा इस कदर ।
हर परवाना बेकरार है जल जाने के लिए ॥

शायद एक कबूल हो जाए कहीं ।
हजार मन्नतें  मागता हूँ, तुझे पाने के लिए ॥

जिन्हे याद रखने को हम समझते है जिन्दगी अपनी ।
वों कही और मशगूल है, हमे भूल जाने के लिए॥

बस आज हुकुमत तुम्हारी , है मेरे "महबूब"।
बन जाओगे तुम भी फ़साना,कल जमाने के लिए॥